Sad Shayari in Hindi
क्यु रोते हो उसकी याद में जो तुम्हारा था ही नहीं
आंसुओं से अगर तकदीर बदलती तो
आज भी वो शख्स आपके साथ होता....!
अब इससे बडी चाहत और क्या होगी.....
तुम नहीं हो मेरे नसीब में
फिर भी बेपनाह चाहते है हम आपको |
उसका वायदा भी अजीब था की उम्र भर साथ निभाएंगे
हमने ये भी नही पूछा की मोहब्बत के साथ या यादो के
वो कह कर गया था कि लौटकर आऊँगा,
मैं इंतजार ना करता तो क्या करता,
वो 'झूठ भी बोल रहा था बड़े सलीके से,
मैं एतबार ना करता तो क्या क्या करता ।
सोचता था दर्द की दौलत से
एक मैं ही मालामाल हूँ
देखा जो गौर से तो हर कोई रईस निकला
आज हम दर्द बन गए उनके लिए
जिनके लिए कभी सुकून हुआ करते थे
किसी को कोई एहसास नहीं होगा
तुम्हारे रोने से इससे अच्छा है
की खुश रहे कुछ ऐसा करें जिससे
वो रोये आपको ना पाकर
सुन कर तमाम रात मेरी दस्ताने ग़म,
वो मुस्कुरा के बोली बहुत बोलते हो तुम।
अब तू ही कोई मेरे ग़म का इलाज कर दे,
तेरा ग़म है तेरे कहने से चला जायेगा।
सुकून न दे सकीं राहतें ज़माने भर की,
जो नींद आई तेरे ग़म की छाँव में आई।
ग़म-ए-इश्क का मारा हूँ मुझे न छेड़ो,
जुबां खुलेगी तो लफ़्ज़ों से लहू टपकेगा।
तकलीफ तो होती है मगर मुस्कुराना जनता है.....
तकलीफ तो होती है मगर
मुस्कुराना जनता है...
और तुम्हारे ना होने का गम ....
तुम्हारे ना होने का गम...
छुपाना भी जनता है…
क्यु रोते हो उसकी याद में जो तुम्हारा था ही नहीं
आंसुओं से अगर तकदीर बदलती तो
आज भी वो शख्स आपके साथ होता....!
अब इससे बडी चाहत और क्या होगी.....
तुम नहीं हो मेरे नसीब में
फिर भी बेपनाह चाहते है हम आपको |
उसका वायदा भी अजीब था की उम्र भर साथ निभाएंगे
हमने ये भी नही पूछा की मोहब्बत के साथ या यादो के
वो कह कर गया था कि लौटकर आऊँगा,
मैं इंतजार ना करता तो क्या करता,
वो 'झूठ भी बोल रहा था बड़े सलीके से,
मैं एतबार ना करता तो क्या क्या करता ।
सोचता था दर्द की दौलत से
एक मैं ही मालामाल हूँ
देखा जो गौर से तो हर कोई रईस निकला
आज हम दर्द बन गए उनके लिए
जिनके लिए कभी सुकून हुआ करते थे
किसी को कोई एहसास नहीं होगा
तुम्हारे रोने से इससे अच्छा है
की खुश रहे कुछ ऐसा करें जिससे
वो रोये आपको ना पाकर
सुन कर तमाम रात मेरी दस्ताने ग़म,
वो मुस्कुरा के बोली बहुत बोलते हो तुम।
अब तू ही कोई मेरे ग़म का इलाज कर दे,
तेरा ग़म है तेरे कहने से चला जायेगा।
सुकून न दे सकीं राहतें ज़माने भर की,
जो नींद आई तेरे ग़म की छाँव में आई।
ग़म-ए-इश्क का मारा हूँ मुझे न छेड़ो,
जुबां खुलेगी तो लफ़्ज़ों से लहू टपकेगा।
तकलीफ तो होती है मगर मुस्कुराना जनता है.....
तकलीफ तो होती है मगर
मुस्कुराना जनता है...
और तुम्हारे ना होने का गम ....
तुम्हारे ना होने का गम...
छुपाना भी जनता है…



















