अपना दरवाज़ा ख़ुला रखता है हमेशा 'नीरज'
ज़िंदगी आती है, आती है मगर चुपके से
~नीरज
जगह, कुदाल, कुआं सब तलाश कर लेंगे
मैं सिर्फ़ सोई हुई प्यास को जगाता हूं
~ देवेन्द्र कुमार आर्य
कुछ तो अपने और मेरे दरमियां रहने दे
दूरियां चुभती हैं, फिर भी दूरियां रहने भी दे
~ राजगोपाल सिंह
पानी को काग़जों में बांधने की ज़िद न कर
मन है, इसे हदों में बांधने की ज़िद न कर
~कुंवर बेचैन
ऐसी काई है अब मकानों पर
धूप के पांव भी फिसलते हैं
~सूर्यभानु गुप्त
उम्रभर कच्ची रहगुज़ारों पर
आहटें सूंघता है सन्नाटा
~सूर्यभानु गुप्त
ख़ुद से रूठे हैं हम लोग
टूटे-फूटे हैं हम लोग
सत्य चुराता नज़रें हमसे
इतने झूठे हैं हम लोग
~शेरजंग गर्ग
समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर, हमने रोशनी की है
~नीरज


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