हमारा दिल बहुत ज़ख़्मी है लेकिन....!
मुहब्बत
सर उठा के जी रही है..
कहीं
पर भी होती अगर एक मंज़िल,
तो
गर्दिश में कोई सितारा न होता ! ये सारे का सारा जहां अपना होता, अगर यह हमारा तुम्हारा
न होता
झूझती
रही...
बिखरती
रही
टूटती
रही.....
कुछ
इस तरह ज़िन्दगी रही !
कभी
आवाज में कशिश थी कभी नजरो में नशा था,
फिर
जो तेरा असर होने लगा होश मै खोने लगा ..
तू
सब देख
मैं
सितम देखता हूँ..!!
ये
जो हर मोड़ पे आ मिलती है मुझसे,
ये
बदनसीबी मेरी
दीवानी
तो नही ?
जिन्हें
गुस्सा आता है वो लोग सच्चे होते हैं,
मैंने झूठों को अक्सर मुस्कुराते हुए देखा है
दोनों
ही बातों से तेरी, एतराज है मुझको,
क्यूँ तू जिंदगी में आई, और क्यूँ चली गई
जीने
के आरजू में मरे जा रहे है लोग,
मरने
के आरजू में जिया जा रहा हु में.
लिखने
चले थे कुछ ख्याल,,,
जाने
कब वो शायरी बन गई…
तुम
तो मुझे रुलाकर दूर चले गये..
मैं
किससे पूछें मेरी खता क्या है..
मर
रहे है पल पल तेरी यादों में,
दम नहीं था सनम तेरे वादों में
तुम्हें
नींद नहीं आती तो कोई
और
वजह होगी...
अब
हर ऐब के लिए कसूरवार इश्क तो नहीं
रात
की सीढ़ी पर चढ़कर...
आसमां
से कुछ सपने उतारने हैं
रुका
हुआ है वो रास्ता आज भी वहाँ... ।
ठहरे थे साथ तुम्हारे हम, एक पल जहाँ
क्या
क्या नहीं बदला तेरे जाने से…
बस
एक मेरे सिवा !!


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