चलो एक poem सुनाते है
एक
आदत थी रिश्ते निभाने की
कोई
दूर जाए फिर भी पास बुलाने की
लोग
छोड़ते रहे फिर भी हम पकड़ते हैं
रिश्तों
की कद्र के लिए वो ना पकड़े फिर भी हम पकड़ते रहे। याद बस हम उतना आए
जब
जब हमने याद किया
रिप्लाई
बस इतने आए जितना हम ने सवाल किया
कद्र
की शाम ढलती गई जोड़ भी कमजोर पड़ती गई टूट
ना
जाए रस्सी शांत हो गए हम तब लोगों को लगा कि
बेपरवाह
हो गए हम हो गए चलो अब अपने लिए कुछ ढूंढ कर लाते हैं
बेपरवाही
से सही अब रिश्तो में थोड़े लापरवाही दिखाते हैं
सोचते
थे कि उनसे बिछड़े तो मर जाएंगे,
गजब
का वहम था, बुखार तक न आया... !!
शोहरत
की भूक हम को कहाँ ले के आ गई.
हम
मोहतरम हुए भी तो किरदार बेच कर
महफ़िल
में ना आऊँ तो महफ़िल में जान कैसे आए
मैं
ख़ुद ग़ज़ल हूँ, मैना गुनगुनाऊँ, तो बात कैसे आए…
कलम
से दिलकी आवाज लिखता हु
गम जुदाई के अन्दाज से ब्या लिखता हु
रुकते
नही आसु जब उसकी याद मे अलफाज लिखता
हमारे
शहर आ जाओ हमेशा बरसात रहती हैं
यहां
कभी बादल बरसता हैं तो कभी आँखे


0 comentários:
Post a Comment